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आध्यात्मिक ज्ञान :सब कुछ मिलने पर भी क्यों हैं अधूरापन

Post by: 08/07/2017 0 comments 318 views

मानव मन की प्रकृति ऐसी है कि वह सदा ही अधूरापन सा महसूस करता है| फिर चाहे वो अलग-अलग भांति की वस्तुओं का संग्रह हो, ज्ञान का संग्रह हो या फिर अन्य लोगों को अपना बनाना हो| किसी न किसी तरह का संग्रहण चलता ही रहता हैं| ऐसा मन जाता हैं कि आधयात्मिकता का अर्थ हैं मन से थोड़ी दूरी बनाना और रिक्त हो जाना

मन की प्रकृति है संग्रहण करना

मन की प्रकृति सदा ही संग्रह करने की होती है| तब जब ये स्थूलरूप में होता है तो चीजों का संग्रह करना चाहता है, तब जब ये थोड़ा-सा विकसित होता है तो ज्ञानार्जन करना चाहता है|

वे तमाम बातें जिन्हें आप सोचते एवं महसूस करते हैं तथा खुद
के बीच जब एक दूरी बनाने लगते हैं तो इसे ही हम चेतना कहते हैं
|”

जब इसमें भावना प्रबल होती हैं तो यह लोगों का संग्रह करना चाहता हैं, इसकी मूल प्रकृति मात्र यही हैं कि यह संग्रहण करना चाहता हैं| मन वस्तुतः एक संग्रहणकर्ता है, सदा ही कुछ न कुछ एकत्र करना, बटोरना चाहता है| जब कोई व्यक्ति यह सोचने और यकीन करने लगता है कि वह आध्यात्मिक मार्ग पर है तो उसका मन आध्यात्मिक ज्ञान का संग्रह करने लग जाता है|

हो सकता है कि यह गुरु के ही शब्दों का संचय करने लगे लेकिन यह जो भी संचित करे, जब तक कोई व्यक्ति संग्रह करने कि आवश्यकता से परे नहीं उठ जाए, तब तक कोई फर्क नहीं पड़ता – चाहे वह भोजन हो, कोई चीज़ हो, सांसारिक ज्ञान हो, लोग हो या आध्यात्मिक ज्ञान हो – यह कोई मायने नहीं रखता कि आप क्या संचय कर रहे हैं| संग्रह करने कि आवश्यकता का अर्थ है कि अभी एक अधूरापन रह गया है| अधूरा होने का भाव प्राणी में घर कर गया है, इसका एकमात्र कारण यह है कि कहीं न कहीं आप अपनी पहचान उन सीमित चीजों के साथ बना लेते हैं जो कि आप हैं ही नहीं|

साधना और चेतना : कृपा के लिए करती हैं तैयार


अगर कोई व्यक्ति अपने जीवन में आवश्यक्तानुसार चेतना प्राप्त कर लेता हैं, और निरन्तर किसी साधना का अभ्यास करता है तो उसका यह पात्र धीरे-धीरे पूर्णत: खाली हो जाता है| चेतना का कार्य पात्र को खाली करना हैं, जबकि साधना का कार्य पात्र को साफ करना हैं|

“जिसे हमारे द्वारा साधना कहा जा रहा हैं वह एक अवसर है अपनी ऊर्जा को
बढ़ाने का ताकि आप अपनी सीमाओं और सभी कमियों पर काबू रख सकें
जिनके कारण आप अपने विचारों तथा भावनाओं में उलझ गए हैं
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जब आप इन दोनों पहलुओं का अपने जीवन में अनुपालन करते हैं, जब लम्बे समय तक चेतना और साधना का पालन एवं अभ्यास करते हैं, तो आपका ये पात्र खाली हो जाता हैं| जब आपके जीवन में शून्यता, खालीपन घटित होती हैं, मात्र तभी आप पर कृपा अवतरित होती हैं| वास्तव में कृपा के बिना कोई कहीं नहीं पहुँचता| अगर आप कृपा का अनुभव करना चाहते हो तो रिक्त होना होगा, अगर आप एक गुरु के साथ रह कर केवल उसके शब्दों का संग्रह कर रहे हैं, तो आपका जीवन उस चींटी से भी ज्यादा निरर्थक हैं जो शीतकाल या वर्षाकाल के लिए भोजन का संग्रहण करती हैं|

बिना कृपा बहुत प्रतीक्षा करनी होगी

अगर आप कृपा का अनुभव नहीं करते, खुद को कृपा ग्रहण करने के काबिल नहीं बनाते, कृपा धारण के लिए खुद को रिक्त नहीं करते तो ये समझा जाए कि आपको कई जन्मो तक आध्यात्मिक मार्ग पर चलना होगा|

“आपके अंदर यही मानसिकता घर कर गई कि जहाँ भी
जाओ वहाँ उतना संग्रह कर लो जितना कर सकते हो”

लेकिन अगर आपने कृपा प्राप्त करने के लिए खुद को पर्याप्त रूप से रिक्त कर लिया हैं तो आपकी परम प्रकृति बहुत दूर नहीं हैं| ठीक यही उसका अनुभव करना हैं, यहीं पर उसका साक्षात्कार करना हैं| सभी आयामों से पार जाने पर हम परमानन्द अवस्था में प्रवेश करते हैं| यह आने वाले काल या किसी अन्य जन्म कि बात नहीं हैं| यहीं एक जीवंत वास्तविकता हैं|

संग्रह करने की मानसिकता अन्दर बैठ गयी हैं

आपके अन्दर यहीं मानसिकता घर कर गई हैं कि जहाँ भी जाओ वहाँ उतना संग्रह कर लो जितना कर सकते हो| मूल रूप से आपकी शिक्षा ही इसके लिए दोषी हैं|

लेकिन यह संग्रह – चाहे आपने कितना भी संचय
क्यों न किया हो, मायने नहीं रखता
|”

आपको अधिक से अधिक सुनियोजित तौर-तरीके सिखाये ताकि आप उतना संग्रह कर सकें जितना कि संभव हो| इस संग्रह से आप अपनी जीवका कमा सकते हैं|

आध्यात्मिक ज्ञान के संग्रह की नहीं साधना की जरुरत हैं

लेकिन यह संग्रह – चाहे आपने कितना भी संचय क्यों न किया हो, मायने नहीं रखता| जो कुछ भी आपने अपने मन में इक्क्ठ्ठा कर रखा हैं, वह चाहे बकवास हो या वैज्ञानिक ज्ञान हो या आध्यात्मिक ज्ञान हो, वह आपको मुक्त नहीं कर सकेगा| आपको अपने जीवन में आवश्यक चेतना को लाने के लिए साधना और आंतरिक कार्य की जरुरत होगी| वास्तव में इसका कोई विकल्प नहीं हैं|

खुद को खो देना होगा

अगर आप छलांग लगाना चाहते हैं,रेखा को लांघना चाहते हैं और चेतना को कायम रखने के संघर्ष से बचना चाहते हैं तो आपको निश्छल होना होगा|

यह कोई ऐसा काम नहीं हैं जिसे आप कर सकें| आपको तो
बस यह स्वीकार करना हैं ताकि यह स्वत: घटित हो सकें
|”

समपर्ण कोई ऐसा कार्य नहीं हैं जो आपको करना हैं, समर्पण वह चीज हैं जो स्वत: तब होता हैं जब आप नहीं होते हैं| जब आप अपनी सारी इच्छाओ को खो देते हैं, जब आपकी अपनी कोई इच्छा नहीं रह जाती, जब आप इसके लिए पूर्णत: तैयार हो जाते हैं कि आपके अंदर ऐसा कुछ नहीं हैं जिसे आप अपना कह सकें तब यहीं वह समय हैं जब आप पर कृपा अवतरित होगी|

साधना और चेतना : आप केवल अनुकूल परिस्थिति बना सकते हैं

लेकिन मैं हमेशा इस बात पर जोर दूँगा कि आप चेतना और साधना के मार्ग पर लगे रहिए| अगर आप सहजतापूर्वक इस रेखा को पर करते हैं तो यह अनोखा हैं लेकिन आप लांघने का प्रयास करते हैं, तो आप देखेंगे कि आप खुद को धोखा दे रहे हैं| क्योंकि ऐसी रेखा को पार किया ही नहीं जा सकता| यह केवल स्वत: ही संभव हैं कोई योग्यता ऐसा नहीं करवा सकती|

हम जिस प्रकार सोच और महसूस कर रहे हैं उसके केवल
निरंतर बंधन का जाल निर्मीत किए जा रहे हैं
|”

अगर आप अपनी सभी क्षमताओं और अक्षमताओं को, सभी पसंदो-नापसंदो को, और बढ़कर, सभी निर्रथक बातों और तत्वों को, जिन्होंने आपको ये सोचने के लिए मजबूर किया हैं कि दरअसल यहीं मैं हूँ’ , अगर आप उन सभी तत्वों को छोड़ने के लिए तैयार हैं जो आपके सीमित अस्तित्व को सहारा देते हैं, तो केवल तभी आप पर कृपा संभव हैं| यह कोई कार्य नहीं हैं जिसे आप कर सकें| आपको तो बस स्वीकार करना हैं ताकि यह स्वत: ही घट जाए|

क्या हैं चेतना और साधना?

हम जिस प्रकार सोच और महसूस कर रहे हैं उससे केवल अनवरत बंधनों का जाल निर्मीत किया जा रहा हैं| वो सब बातें जिन्हें आप सोचते और महसूस करते हैं तथा जब अपने बीच एक दूरी बनाने लगते हैं तो इसे ही चेतना कहते हैं | जिसे हम साधना कह रहे हैं वो एक अवसर हैं अपनी ऊर्जा बढ़ाने का ताकि अपनी सीमाओं तथा कमियों पर काबू रख सकें|

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