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नरसिंह मेहता

Post by: 24/08/2017 0 comments 130 views

परिचय

नरसिंह मेहता जो कि नरसी मेहता और नरसी भगत के नाम से भी जाने जाते है, जो कि एक वैष्णव कवि संत थे और भक्त के रूप में प्रसिद्ध हुए है । नरसी भगत गुजराती साहित्य में बहुत प्रसिद्ध हुए जहाँ उन्हें आदिकवि के रूप में जाना गया । उनका भजन वैष्णव जान महात्मा गाँधी का पसंदीदा भजन था और वो भजन उनके लिए आदर्श बन गया था ।

जीवनी

नरसिंह मेहता तलाजा में पैदा हुए थे, जब वे ५ साल के थे तब उनके माता- पिता का देहांत हो गया था और वे ८ साल की आयु तक बोल नहीं सकते थे, नरसिंह मेहता का पालन- पोषण उनकी दादी ने किया था ।

उनका विवाह वर्ष १४२९ में माणिकबाई से हुआ था । तब मेहता और उनकीं पत्नी उनके भाई बंसीधर के घर जूनागढ़ में रुके थे । बंसीधर की पत्नी ने नरसिंह का स्वागत बिलकुल भी अच्छी तरह से नहीं किया था । वो एक नास्तिक महिला थी जो की हमेशा नरसिंह मेहता का अपमान करती थी और उनकी भक्ति- पूजा के लिए उनको ताना मारा करती थी । एक दिन जब मेहता अपनी भाभी के तानो और अपमान से परेशान हो गए तो वे घर छोड़कर शांति की खोज में जंगल में चले गए और वहाँ उन्होंने ७ दिनों तक शिवजी की पूजा की और तब तक उनका ध्यान किया जब तक शिवजी उनके सामने प्रकट नहीं हुए । कवि के बार बार अनुरोध करने पर भगवान उनको वृन्दावन ले गए और वहां उनको भगवान श्री कृष्णा और गोपियों की रास-लीला दिखाई।

नरसिंह मेहता का जन्म तलाजा में हुआ था , जब वे ५ साल के थे तब उनके माता- पिता का देहांत हो गया था और वे ८ साल की आयु तक बोल नहीं सकते थे, नरसिंह मेहता का पालन- पोषण उनकी दादी ने किया था ।

उनका विवाह वर्ष १४२९ में माणिकबाई से हुआ था । तब मेहता और उनकीं पत्नी उनके भाई बंसीधर के घर जूनागढ़ में रुके थे । बंसीधर की पत्नी ने नरसिंह का स्वागत बिलकुल भी अच्छी तरह से नहीं किया था । वो एक नास्तिक महिला थी जो की हमेशा नरसिंह मेहता का अपमान करती थी और उनकी भक्ति- पूजा के लिए उनको ताना मारा करती थी । एक दिन जब मेहता अपनी भाभी के तानो और अपमान से परेशान हो गए तो वे घर छोड़कर शांति की खोज में जंगल में चले गए और वहाँ उन्होंने ७ दिनों तक शिवजी की पूजा की और तब तक उनका ध्यान किया जब तक शिवजी उनके सामने प्रकट नहीं हुए । कवि के बार बार अनुरोध करने पर भगवान उनको वृन्दावन ले गए और वहां उनको भगवान श्री कृष्णा और गोपियों की रास-लीला दिखाई।

एक कहावत हैं कि एक बार तमाशे के दौरान उन्होंने हाथ में पकड़ी हुई मशाल से अपना हाथ जला लिया और वे उस वक़्त भक्ति में इतने खोये हुए थे कि उन्हें दर्द का एहसास भी नहीं हुआ । मेहता ने कृष्णा के आदेश पर उनकी प्रशंसा और रस के अमृत अनुभव को गाने का निश्चय किया और उन्होंने कृष्णा की २२००० कीर्तन रचनाओं को लिखने का सकंल्प लिया ।

इस दिव्य अनुभव को प्राप्त करने के बाद मेहता पुनः अपने गांव लौटे और अपनी बहन के पैरो को छुकर उन्हें अपने आपको अपमानित करने के लिए धन्यवाद दिया क्योंकि उन्होंने उन्हें परेशान नहीं किया था और उनको ये एहसास हुआ कि भगवान श्री कृष्णा की भक्ति के सर्वोच्च गुण है |

इसके पश्चात् मेहता अपने परिवार के साथ जूनागढ़ चले गए, वहां वें उनकीं पत्नी और २ बच्चों के साथ गरीबी का जीवन जी रहे थे | मेहता का पुत्र का नाम श्यामलदास और पुत्री का नाम कुवंरबाई था जिनके प्रति मेहता का विशेष स्नेह था | मेहता सभी लोगों के लिए जाति या लिंग भेद के बावजुद भी अपने मन में समर्पण भाव रखते थे | भगवान श्री कृष्णा की महिमा के गान के लिए सामाजिक स्तर से नीचे के लोगों का सहयोग पाने के लिए मेहता की प्रतिष्ठा भी समाज में गिर गई थी, जिसकी वजह से जुनागढ के लोग उन्हें तुच्छ समझने लगें उनको घृणा की नजरों से देखने लगे और उनको अपमानित करने लगें | इस समय तक मेहता ने भगवान श्री कृष्णा और राधा की रासलीला के बारे में भी गाये थे, इन रचनाओं को श्रृंगार रचनाओं की श्रेणी में एकत्रित किया जाता है | जो कि सर्वोच्च भगवान और उनके सबसे घनिष्ट भक्तों – गोपी के बीच वैवाहिक प्रेम के गानों पर आधारित थे |

१४४७ में मेहता ने अपनीं बेटी कुंवरबाई की शादी उमर के बेटे श्रीरंग मेहता से शादी कर दी, कुंवरबाई के गर्भवती होने के सातवें महीने में लड़की के माता – पिता को उपहार देने के लिए कहाँ गया था | ममरू के नाम से प्रचलित यह प्रथा भौतिकवादी गरीब नरसिंह मेहता की पहुँच से बाहर थी, जो अपने प्रभु में अविश्वासी विश्वास के आलावा कुछ नहीं था | कृष्णा ने अपने प्रिय भक्त की कैसे मदद की ये एक पौराणिक चित्रित कथा ‘ मामरू ना पडा ‘ में दर्शाया गया है | बाद में कवियों और फिल्मो द्वारा गुजराती लोगों की स्मृति में इस समय के प्रकरण को संरक्षित किया गया है | इस समय के अन्य प्रचलित कहानियों में ‘ हुंडी ‘ और ‘ हारमाला ‘ प्रकरण, गुजरात के श्यामलसा सेठ जिनकी लिखी हुई पुरे गुजरात में ही नहीं बल्कि भारत के दुसरे हिस्सों में भी प्रचलित थी और उनके अलावा किसी अन्य किसी की भी हुंडी को कोई मंजूरी नहीं देता था | एक बार नरसिंह मेहता को अपनी बेगुनाही साबित करने के लिए कहा गया और उन्हें भगवान के गले से माला अलग करना थी और उन्होंने भगवान श्री कृष्णा की आराधना करके अपनी बेगुनाही साबित की यही कहानी हारमाला से जुडी हुई है | मेहता ने इस कहानी में यह भी दर्शाया है कि किस तरह से श्री कृष्णा ने एक धनी व्यापारी के रूप में मेहता के बेटे की शादी में उनकी मदद की जिसको कवियों ने ‘ पुत्र विवाह ना पडा ‘ में गाया है | कहा जाता है कि बाद में मेहता मंगलोल चले गए वहां ७९ वर्ष की उम्र में उनकी मृत्यु हो गई | मंगलोल में श्मसान को ” नरसिंह – नू – सैमन ” कहा जाता है जहाँ गुजरात के पुत्रों में से एक महत्वपूर्ण महान वैष्णव का अंतिम संस्कार किया गया था | मेहता गुजरात के पहले आदिकवि के रूप में जाने जाते है जो हमेशा अपने कविवर्य कार्यो और भगवान कृष्णा के प्रति समर्पण के लिए याद रहेंगे |

कार्य

मेहता गुजराती साहित्य के अग्रणी कवि हैं। वह “साहित्य”, “आख्यान” और “प्रभाति” नामक साहित्यिक रूपों के लिए जाना जाता है। मेहता की कृतियों की सबसे महत्वपूर्ण विशेषताओं में से एक यह है कि वे उस भाषा में उपलब्ध नहीं हैं, जिसमें नरसिंह ने उन्हें बना लिया था। ये बड़े पैमाने पर मौखिक रूप से संरक्षित किया गया है, उनका सबसे पुराण लेख वर्ष १६१२ के समय का है जो के गुजरात विद्या सभा के प्रसिद्ध विद्वान केशवराम काशीराम शास्त्री को मिला | अपने द्वारा किये गए कामों की लोकप्रियता के कारण उनकी भाषा में भी बदलाव आया और मेहता ने भगवान श्री कृष्णा के नाम पर बहुत से भजन और आरती लिखी जो के कई किताबो में प्रकाशित हुए, मेहता की आत्मकथा गीता प्रेस में भी उपलब्ध है |

 

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