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भगवान शिव के जन्म का रहस्य

Post by: 11/11/2017 0 comments 67 views

भगवान शिव के रहस्य

हिन्दू पौराणिक कथाओ में भगवान शिव को नाश करने वाला और पवित्र त्रिमूर्तियों में सबसे महत्वपूर्ण बताया गया हैं और अन्य २ में एक ब्रह्मा जो कि रचियता और विष्णु रक्षक हैं | भगवान शिव ने हमेशा अपने भक्तों को अपने होने का एहसास करवाते हैं | उनके २ नहीं ३ आँखे हैं, उनके पुरे शरीर पर राख लगी होती हैं और उनके गले में साँप लिपटा रहता है, वे बाघ और हाथी की खाल को कपड़ो के रूप में धारण करते है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि वो जंगली जीवन जीते हैं, वे सामाजिक प्रहारों से बहुत दूर हैं और अपने लौकिक क्रोध के लिए जाने जाते हैं |

भगवान शिव के जन्म का रहस्य

भगवान शिव के जन्म के पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी हैं, एक समय की बात हैं, ब्रह्मा और विष्णु दोनों इस बात को लेकर एक दूसरे से बहस कर रहे थे कि हम दोनों में अधिक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण कौन हैं | उनकी इसी चर्चा के बीच उन्हें एक स्तम्भ दिखाई देता हैं जिसका उनको ना तो कोई अंतिम छोर दिखाई दिया और न ही ये दिखाई दिया कि उस स्तम्भ की शुरुआत कहा से हो रही हैं |
इस स्तम्भ को देखकर वो दोनों आश्चर्यचकित हो गए क्युकि उस स्तम्भ की जड़े धरती की गहराई में घुसी हुई थी, अब वो दोनों आश्चर्यचकित होकर उन दोनों ने सोचा की ये शायद कोई तीसरी संस्था हो सकती हैं जो उन दोनों की वरीयता को चुनौती दे रहा था | अब उन दोनों की अपने वर्चस्व पर बहस कम हो गई और वे दोनों सोचने लगे कि तीसरी संस्था कैसी हो सकती हैं |

तीसरी शक्ति

ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही उस स्तम्भ के प्राम्भ और अंत का पता लगाने के लिए निकल गए, ब्रह्मा जी एक हंस के रूप में स्तम्भ की चोटी का पता लगाने के लिए उड़ गए और विष्णु जी एक सूअर में घुस गए और उस स्तम्भ की जड़ो का पता लगाने के लिए धरती में खुदाई शुरू की | खोज की यह प्रक्रिया बहुत लम्बे समय तक चली लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला और वे दोनों अपनी – अपनी खोज में असफल हुए |

अपने असफल प्रयासों के बाद उन दोनों ने विनम्र महसूस किया और अपने मूल स्थान पर लौट आये भगवान शिव को अपने असली रूप में प्रकट करने के लिए जिसको वे समझ सकें | अब वें शिव की शक्ति को महसूस करने लगते हैं और उनके लौकिक अस्तित्व को समझने को कोशिश करते हैं जो कि उनकी समझ से परे हैंऔर वास्तव में वें भगवान शिव थे जो उनसे अधिक शक्तिशाली थे | इस प्रकार भगवान शिव के इस दिव्य नाटक से उन्होंने समझ लिया की ब्रह्मांड पर शासन करने वाली यह एक तीसरी शक्ति है |

भगवान शिव की जीवनशैली

भगवान शिव एक रहस्यमय देवता हैं, उनके तरीकों को पृथ्वी के मानदंडों और परिभाषाओं द्वारा कभी- भी परिभाषित नहीं किया जा सकता हैं| भगवान शिव का घर शमसान हैं और वो पशु त्वचा और खोपड़ी माला को अपने वस्त्रों के रूप में धारण करते हैं, भगवान शिव कई तरह की भूमिकाओं का निर्वहन करते हैं और पुरे ब्रह्मांड पर अपनी शक्तिशाली शक्ति का प्रयोग करते हैं |

भयानक दिखने वाले राक्षस,भूत,प्रेत जो हमेशा रक्त के प्यासे रहते हैं और कुछ भी विनाश कर देने वाले भगवान शिव की सेना में शामिल हैं | भगवान शिव की सेना सभी ज्ञात संसारो में और इसके आगे भगवान शिव के मिशन को पूरा करने में लगी हैं |

भगवान शिव के ध्यानवादी शक्तियां

यद्यपि भगवान शिव को सभी एक क्रूर देवता के रूप में जानते हैं, भगवान शिव हिमालय पर गहरे ध्यान की मुद्रा में रहते हैं | भगवान शिव की मूल प्रकृति क्या है इसका पता लगा पाना बहुत मुश्किल हैं, क्युकी वें एक और तो गहरे ध्यान में पूरी तरह से मौन रहते हैं और दूसरी तरफ उनके जीवंत क्रूर कार्य |

भगवान शिव का लौकिक नृत्य

जब शिव अपने तांडव नृत्य में खोये हुए रहते हैं तो उनका यह ब्रह्मांडीय नृत्य अज्ञानता और अस्थायिता पर सच्चाई की विजय का प्रतीक हैं | भगवान शिव का यह नृत्य पुरे ब्रह्मण्ड के प्रत्येक कण को एक मजबूत कंपन के स्थापित करने में सक्षम बनाता हैं | भगवान शिव का यह नृत्य उनके भक्तों के कष्टों को दूर करता हैं और अज्ञानता के बादलों को दूर करते हुए उनमें विश्वास, आशा, और ज्ञान को स्थापित करता हैं |

भगवान शिव और पांच तत्व

जब भगवान शिव उनके दिव्य नृत्य में मग्न होते हैं तो उस समय भी वे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अपने नृत्य के स्थान के रूप में दिखाए गए आकाश, बहती हुई गंगा और अग्नि सहित सभी पांचो तत्वों को अपने साथ अपने पास रखते हैं और अपनी हथेली पर बढ़ते हुए हिरन का प्रतीक तथा ब्रह्मांडीय अंतरिक्ष जिसमें वें अपने उत्साहपूर्ण नृत्य को क्रियान्वित करते हैं|

विनाशक का रक्षक के रूप में प्रकट होना

जैसा की हम सभी जानते हैं, भगवान शिव को एक विनाशक के रूप में जाना जाता हैं| अर्थात जिस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु इस धरती के रचियता और पालनहार \ रक्षक के रूप में हैं उसी प्रकार भगवान शिव नाशक हैं|

एक बार जब सभी देवता और राक्षस मिलकर समुन्द्र मंथन कर रहे थे तब समुन्द्र से हलाहल नामक विष निकला और उस विष से निकलने वाले धुएं से जब सब देवता और राक्षस जलने लगे तब भगवान शिव ने सभी के रक्षक के रूप में आकर उस विष को निगल लिया और इस प्रकार भगवान शिव ने सभी की रक्षा की और धरती को उस घातक विष के दुष्प्रभाव से बचाया|

इस प्रकार भगवान शिव को सबसे दयालु और भोले देवता के रूप में जाना जाता है जो पुरे संसार और ब्रह्माण्ड की सुरक्षा करते है और हमेशा ब्रह्मण्ड की सुरक्षा के लिए तैयार रहते हैं|

भगवान शिव के नीले कंठ

भगवान शिव को “नीलकंठ” के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है नीले गले अथवा नीले कंठ वाले, जब धरती को हलाहल विष के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए भगवान ने उस विष को पी लिया था और उसी समय देवी पार्वती ने भगवान शिव के गले को पकड़ लिया| इस घटना ने भगवान शिव के गले को नीला रंग का बना दिया और तभी से सभी देवताओं ने मिलकर भगवान शिव का नाम नीलकंठ रख दिया|

भगवान शिव के द्वारा गंगा नदी के प्रवाह को वश में करना

एक बार जब गंगा नदी पृथ्वी को सूखा छोड़कर स्वर्ग के माध्यम से निकल रही थी तो एक व्यक्ति के द्वारा नदी के मार्ग को बदल दिया गया तो क्रोध में आकर गंगा ने अपने प्रवाह को तेज करके धरती पर बाढ़ लाने की धमकी दी और जब गंगा नदी ऐसा कर रही थी भगवान शिव धरती और स्वर्ग के बीच में आकर खड़े हो गए और गंगा के तेज प्रवाह को अपनी जटाओं में कैद कर लिया और धरती को गंगा नदी के क्रोध से बचाया|

भगवान शिव की पूजा एक लिंग के रूप में

भगवान शिव की पूजा लिंग के रूप में की जाती है, जिनमें कुछ भारत भर में बहुत से स्थानों पर है और इसे शिवलिंग के नाम से भी जाना जाता हैं| यह लिंग ब्रह्मण्ड के निर्माण, स्थिरता और उसमें शिव की भूमिका का प्रतीक हैं|

भगवान शिव के अवतार

भगवान विष्णु के समान ही भगवान शिव के भी बहुत अवतार थे, जैसे की वीरभद्र, जिसने दक्ष के यज्ञ को रोकने के लिए उसमे बाधा डालने के लिए अपना सिर काट दिया था| सती पिंड की रक्षा के लिए उन्होंने भैरव का अवतार लिया जिसे कालभैरव भी कहा जाता है| खंडोबा, महाराष्ट्रीयन और कन्नड़ संस्कृतियों में जाना जाने वाला शिव का एक और अवतार हैं तथा अंत में हनुमान अवतार जो के भगवान राम के युग में उनके ग्यारहवे रुद्रावतार के रूप में जाना जाता हैं|

भगवान शिव के विभिन्न पहलु

अपने सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा करते समय हिन्दू भगवान शिव को एक विभूद्ध प्रकृति के साथ चित्रित करते हैं, यजुर्वेद में भगवान शिव का उल्लेख घातक और शुभ गुणों के रूप में किया गया हैं तथा महाभारत में उनको सम्मान, प्रसन्नता और प्रतिभा के रूप में चित्रित किया गया हैं| भगवान शिव के रूद्र रूप का अर्थ हैं “जंगली या भयंकर” तथा भगवान शिव को शंभु के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है खुशी का कारण बनना|

शिवलिंग घर पर कैसे स्थापित करें

शिवलिंग की पूजा भगवान शिव के रूप में की जाती हैं तथा बहुत से भक्त भगवान शिव की पूजा पूरी और सही विधि से करने के लिए शिवलिंग अपने घरों में स्थापित करते हैं| शिव पुराण में उल्लेखित हैं कि, शिवलिंग भगवान शिव का प्रतीक हैं जिसका उच्च सम्मान किया जाना आवश्यक हैं| इसलिए, ‘पूजा कक्ष या घर’ में शिवलिंग स्थापित करने से पहले कुछ नियमो का पालन करना आवश्यक हैं, जैसे कि-

गणपति देव की पूजा

जिस जगह पर शिवलिंग को स्थापित किया जाना हैं, सबसे पहले उस जगह को गौमूत्र और गंगाजल से शुद्ध किया जाना चाहिए, भूमि पूजन किया जाना चाहिए तथा भगवान गणेश की पूजा करने के पश्चात् ही शिवलिंग को स्थापित किया जाना चाहिए|

शिवलिंग की शुद्धि

शिवलिंग को उसकी जगह पर स्थापित करने से पहले शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करके उसको शुद्ध करना चाहिए तथा स्थापित करने के बाद शिव मंत्रो का जाप करना चाहिए|

भगवान शिव द्वारा बताया गया मोक्ष का रास्ता

भगवान शिव और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय ने एक बार अपने पिता से उद्धार के बारे में पूछा तो भगवान शिव ने उनको बताया की हर युग में मोक्ष का अलग अलग रास्ता हैं तथा कलयुग में उस रास्ते के रूप कर्म और धर्म पर जोर दिया गया हैं|

प्रमुख नदियाँ

भगवान शिव के अनुसार गंगा नदी के अलावा गोदावरी, नर्मदा, तापती, यमुना, शिप्रा, गौतमी, कौशिकी, कावेरी, सिंधु, गंडकी और सरस्वती नदियाँ भी पवित्र हैं और ये भी आदमी के पापों को धोने में सक्षम हैं|

प्रमुख स्थान

काशी के अलावा अयोध्या, द्वारका, मथुरा, अवंती, कुरुक्षेत्र, रामतीर्थ, पुरषोत्तम क्षेत्र, पुष्कर क्षेत्र, वराह क्षेत्र जैसे स्थान भी दुनिया के दुखो से एक मनुष्य को मुक्ति देने में सक्षम हैं|

Credit- speakingtree

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Naveen

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