Gods and Goddesses

भगवान शिव के जन्म का रहस्य

भगवान शिव के रहस्य

हिन्दू पौराणिक कथाओ में भगवान शिव को नाश करने वाला और पवित्र त्रिमूर्तियों में सबसे महत्वपूर्ण बताया गया हैं और अन्य २ में एक ब्रह्मा जो कि रचियता और विष्णु रक्षक हैं | भगवान शिव ने हमेशा अपने भक्तों को अपने होने का एहसास करवाते हैं | उनके २ नहीं ३ आँखे हैं, उनके पुरे शरीर पर राख लगी होती हैं और उनके गले में साँप लिपटा रहता है, वे बाघ और हाथी की खाल को कपड़ो के रूप में धारण करते है जिससे ऐसा प्रतीत होता है कि वो जंगली जीवन जीते हैं, वे सामाजिक प्रहारों से बहुत दूर हैं और अपने लौकिक क्रोध के लिए जाने जाते हैं |

भगवान शिव के जन्म का रहस्य

भगवान शिव के जन्म के पीछे एक बहुत ही रोचक कहानी हैं, एक समय की बात हैं, ब्रह्मा और विष्णु दोनों इस बात को लेकर एक दूसरे से बहस कर रहे थे कि हम दोनों में अधिक शक्तिशाली और महत्वपूर्ण कौन हैं | उनकी इसी चर्चा के बीच उन्हें एक स्तम्भ दिखाई देता हैं जिसका उनको ना तो कोई अंतिम छोर दिखाई दिया और न ही ये दिखाई दिया कि उस स्तम्भ की शुरुआत कहा से हो रही हैं |
इस स्तम्भ को देखकर वो दोनों आश्चर्यचकित हो गए क्युकि उस स्तम्भ की जड़े धरती की गहराई में घुसी हुई थी, अब वो दोनों आश्चर्यचकित होकर उन दोनों ने सोचा की ये शायद कोई तीसरी संस्था हो सकती हैं जो उन दोनों की वरीयता को चुनौती दे रहा था | अब उन दोनों की अपने वर्चस्व पर बहस कम हो गई और वे दोनों सोचने लगे कि तीसरी संस्था कैसी हो सकती हैं |

तीसरी शक्ति

ब्रह्मा और विष्णु दोनों ही उस स्तम्भ के प्राम्भ और अंत का पता लगाने के लिए निकल गए, ब्रह्मा जी एक हंस के रूप में स्तम्भ की चोटी का पता लगाने के लिए उड़ गए और विष्णु जी एक सूअर में घुस गए और उस स्तम्भ की जड़ो का पता लगाने के लिए धरती में खुदाई शुरू की | खोज की यह प्रक्रिया बहुत लम्बे समय तक चली लेकिन उसका कोई परिणाम नहीं निकला और वे दोनों अपनी – अपनी खोज में असफल हुए |

अपने असफल प्रयासों के बाद उन दोनों ने विनम्र महसूस किया और अपने मूल स्थान पर लौट आये भगवान शिव को अपने असली रूप में प्रकट करने के लिए जिसको वे समझ सकें | अब वें शिव की शक्ति को महसूस करने लगते हैं और उनके लौकिक अस्तित्व को समझने को कोशिश करते हैं जो कि उनकी समझ से परे हैंऔर वास्तव में वें भगवान शिव थे जो उनसे अधिक शक्तिशाली थे | इस प्रकार भगवान शिव के इस दिव्य नाटक से उन्होंने समझ लिया की ब्रह्मांड पर शासन करने वाली यह एक तीसरी शक्ति है |

भगवान शिव की जीवनशैली

भगवान शिव एक रहस्यमय देवता हैं, उनके तरीकों को पृथ्वी के मानदंडों और परिभाषाओं द्वारा कभी- भी परिभाषित नहीं किया जा सकता हैं| भगवान शिव का घर शमसान हैं और वो पशु त्वचा और खोपड़ी माला को अपने वस्त्रों के रूप में धारण करते हैं, भगवान शिव कई तरह की भूमिकाओं का निर्वहन करते हैं और पुरे ब्रह्मांड पर अपनी शक्तिशाली शक्ति का प्रयोग करते हैं |

भयानक दिखने वाले राक्षस,भूत,प्रेत जो हमेशा रक्त के प्यासे रहते हैं और कुछ भी विनाश कर देने वाले भगवान शिव की सेना में शामिल हैं | भगवान शिव की सेना सभी ज्ञात संसारो में और इसके आगे भगवान शिव के मिशन को पूरा करने में लगी हैं |

भगवान शिव के ध्यानवादी शक्तियां

यद्यपि भगवान शिव को सभी एक क्रूर देवता के रूप में जानते हैं, भगवान शिव हिमालय पर गहरे ध्यान की मुद्रा में रहते हैं | भगवान शिव की मूल प्रकृति क्या है इसका पता लगा पाना बहुत मुश्किल हैं, क्युकी वें एक और तो गहरे ध्यान में पूरी तरह से मौन रहते हैं और दूसरी तरफ उनके जीवंत क्रूर कार्य |

भगवान शिव का लौकिक नृत्य

जब शिव अपने तांडव नृत्य में खोये हुए रहते हैं तो उनका यह ब्रह्मांडीय नृत्य अज्ञानता और अस्थायिता पर सच्चाई की विजय का प्रतीक हैं | भगवान शिव का यह नृत्य पुरे ब्रह्मण्ड के प्रत्येक कण को एक मजबूत कंपन के स्थापित करने में सक्षम बनाता हैं | भगवान शिव का यह नृत्य उनके भक्तों के कष्टों को दूर करता हैं और अज्ञानता के बादलों को दूर करते हुए उनमें विश्वास, आशा, और ज्ञान को स्थापित करता हैं |

भगवान शिव और पांच तत्व

जब भगवान शिव उनके दिव्य नृत्य में मग्न होते हैं तो उस समय भी वे पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और अपने नृत्य के स्थान के रूप में दिखाए गए आकाश, बहती हुई गंगा और अग्नि सहित सभी पांचो तत्वों को अपने साथ अपने पास रखते हैं और अपनी हथेली पर बढ़ते हुए हिरन का प्रतीक तथा ब्रह्मांडीय अंतरिक्ष जिसमें वें अपने उत्साहपूर्ण नृत्य को क्रियान्वित करते हैं|

विनाशक का रक्षक के रूप में प्रकट होना

जैसा की हम सभी जानते हैं, भगवान शिव को एक विनाशक के रूप में जाना जाता हैं| अर्थात जिस प्रकार ब्रह्मा और विष्णु इस धरती के रचियता और पालनहार \ रक्षक के रूप में हैं उसी प्रकार भगवान शिव नाशक हैं|

एक बार जब सभी देवता और राक्षस मिलकर समुन्द्र मंथन कर रहे थे तब समुन्द्र से हलाहल नामक विष निकला और उस विष से निकलने वाले धुएं से जब सब देवता और राक्षस जलने लगे तब भगवान शिव ने सभी के रक्षक के रूप में आकर उस विष को निगल लिया और इस प्रकार भगवान शिव ने सभी की रक्षा की और धरती को उस घातक विष के दुष्प्रभाव से बचाया|

इस प्रकार भगवान शिव को सबसे दयालु और भोले देवता के रूप में जाना जाता है जो पुरे संसार और ब्रह्माण्ड की सुरक्षा करते है और हमेशा ब्रह्मण्ड की सुरक्षा के लिए तैयार रहते हैं|

भगवान शिव के नीले कंठ

भगवान शिव को “नीलकंठ” के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है नीले गले अथवा नीले कंठ वाले, जब धरती को हलाहल विष के दुष्प्रभाव से बचाने के लिए भगवान ने उस विष को पी लिया था और उसी समय देवी पार्वती ने भगवान शिव के गले को पकड़ लिया| इस घटना ने भगवान शिव के गले को नीला रंग का बना दिया और तभी से सभी देवताओं ने मिलकर भगवान शिव का नाम नीलकंठ रख दिया|

भगवान शिव के द्वारा गंगा नदी के प्रवाह को वश में करना

एक बार जब गंगा नदी पृथ्वी को सूखा छोड़कर स्वर्ग के माध्यम से निकल रही थी तो एक व्यक्ति के द्वारा नदी के मार्ग को बदल दिया गया तो क्रोध में आकर गंगा ने अपने प्रवाह को तेज करके धरती पर बाढ़ लाने की धमकी दी और जब गंगा नदी ऐसा कर रही थी भगवान शिव धरती और स्वर्ग के बीच में आकर खड़े हो गए और गंगा के तेज प्रवाह को अपनी जटाओं में कैद कर लिया और धरती को गंगा नदी के क्रोध से बचाया|

भगवान शिव की पूजा एक लिंग के रूप में

भगवान शिव की पूजा लिंग के रूप में की जाती है, जिनमें कुछ भारत भर में बहुत से स्थानों पर है और इसे शिवलिंग के नाम से भी जाना जाता हैं| यह लिंग ब्रह्मण्ड के निर्माण, स्थिरता और उसमें शिव की भूमिका का प्रतीक हैं|

भगवान शिव के अवतार

भगवान विष्णु के समान ही भगवान शिव के भी बहुत अवतार थे, जैसे की वीरभद्र, जिसने दक्ष के यज्ञ को रोकने के लिए उसमे बाधा डालने के लिए अपना सिर काट दिया था| सती पिंड की रक्षा के लिए उन्होंने भैरव का अवतार लिया जिसे कालभैरव भी कहा जाता है| खंडोबा, महाराष्ट्रीयन और कन्नड़ संस्कृतियों में जाना जाने वाला शिव का एक और अवतार हैं तथा अंत में हनुमान अवतार जो के भगवान राम के युग में उनके ग्यारहवे रुद्रावतार के रूप में जाना जाता हैं|

भगवान शिव के विभिन्न पहलु

अपने सर्वोच्च देवता के रूप में पूजा करते समय हिन्दू भगवान शिव को एक विभूद्ध प्रकृति के साथ चित्रित करते हैं, यजुर्वेद में भगवान शिव का उल्लेख घातक और शुभ गुणों के रूप में किया गया हैं तथा महाभारत में उनको सम्मान, प्रसन्नता और प्रतिभा के रूप में चित्रित किया गया हैं| भगवान शिव के रूद्र रूप का अर्थ हैं “जंगली या भयंकर” तथा भगवान शिव को शंभु के नाम से भी जाना जाता है जिसका अर्थ है खुशी का कारण बनना|

शिवलिंग घर पर कैसे स्थापित करें

शिवलिंग की पूजा भगवान शिव के रूप में की जाती हैं तथा बहुत से भक्त भगवान शिव की पूजा पूरी और सही विधि से करने के लिए शिवलिंग अपने घरों में स्थापित करते हैं| शिव पुराण में उल्लेखित हैं कि, शिवलिंग भगवान शिव का प्रतीक हैं जिसका उच्च सम्मान किया जाना आवश्यक हैं| इसलिए, ‘पूजा कक्ष या घर’ में शिवलिंग स्थापित करने से पहले कुछ नियमो का पालन करना आवश्यक हैं, जैसे कि-

गणपति देव की पूजा

जिस जगह पर शिवलिंग को स्थापित किया जाना हैं, सबसे पहले उस जगह को गौमूत्र और गंगाजल से शुद्ध किया जाना चाहिए, भूमि पूजन किया जाना चाहिए तथा भगवान गणेश की पूजा करने के पश्चात् ही शिवलिंग को स्थापित किया जाना चाहिए|

शिवलिंग की शुद्धि

शिवलिंग को उसकी जगह पर स्थापित करने से पहले शिवलिंग का पंचामृत से अभिषेक करके उसको शुद्ध करना चाहिए तथा स्थापित करने के बाद शिव मंत्रो का जाप करना चाहिए|

भगवान शिव द्वारा बताया गया मोक्ष का रास्ता

भगवान शिव और पार्वती के ज्येष्ठ पुत्र कार्तिकेय ने एक बार अपने पिता से उद्धार के बारे में पूछा तो भगवान शिव ने उनको बताया की हर युग में मोक्ष का अलग अलग रास्ता हैं तथा कलयुग में उस रास्ते के रूप कर्म और धर्म पर जोर दिया गया हैं|

प्रमुख नदियाँ

भगवान शिव के अनुसार गंगा नदी के अलावा गोदावरी, नर्मदा, तापती, यमुना, शिप्रा, गौतमी, कौशिकी, कावेरी, सिंधु, गंडकी और सरस्वती नदियाँ भी पवित्र हैं और ये भी आदमी के पापों को धोने में सक्षम हैं|

प्रमुख स्थान

काशी के अलावा अयोध्या, द्वारका, मथुरा, अवंती, कुरुक्षेत्र, रामतीर्थ, पुरषोत्तम क्षेत्र, पुष्कर क्षेत्र, वराह क्षेत्र जैसे स्थान भी दुनिया के दुखो से एक मनुष्य को मुक्ति देने में सक्षम हैं|

Credit- speakingtree

हनुमान चालीसा और श्री हनुमान जी की आरती

हनुमान चालीसा

॥दोहा॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।
बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

बुद्धिहीन तनु जानिके सुमिरौं पवन-कुमार ।
बल बुधि बिद्या देहु मोहिं हरहु कलेस बिकार ॥

॥चौपाई॥

जय हनुमान ज्ञान गुन सागर ।
जय कपीस तिहुँ लोक उजागर ॥१॥

राम दूत अतुलित बल धामा ।
अञ्जनि-पुत्र पवनसुत नामा ॥२॥

महाबीर बिक्रम बजरङ्गी ।
कुमति निवार सुमति के सङ्गी ॥३॥

कञ्चन बरन बिराज सुबेसा ।
कानन कुण्डल कुञ्चित केसा ॥४॥

हाथ बज्र औ ध्वजा बिराजै ।
काँधे मूँज जनेउ साजै ॥५॥

सङ्कर सुवन केसरीनन्दन ।
तेज प्रताप महा जग बन्दन ॥६॥

बिद्यावान गुनी अति चातुर ।
राम काज करिबे को आतुर ॥७॥

प्रभु चरित्र सुनिबे को रसिया ।
राम लखन सीता मन बसिया ॥८॥

सूक्ष्म रूप धरि सियहिं दिखावा ।
बिकट रूप धरि लङ्क जरावा ॥९॥

भीम रूप धरि असुर सँहारे ।
रामचन्द्र के काज सँवारे ॥१०॥

लाय सञ्जीवन लखन जियाये ।
श्रीरघुबीर हरषि उर लाये ॥११॥

रघुपति कीह्नी बहुत बड़ाई ।
तुम मम प्रिय भरतहि सम भाई ॥१२॥

सहस बदन तुह्मारो जस गावैं ।
अस कहि श्रीपति कण्ठ लगावैं ॥१३॥

सनकादिक ब्रह्मादि मुनीसा ।
नारद सारद सहित अहीसा ॥१४॥

जम कुबेर दिगपाल जहाँ ते ।
कबि कोबिद कहि सके कहाँ ते ॥१५॥

तुम उपकार सुग्रीवहिं कीह्ना ।
राम मिलाय राज पद दीह्ना ॥१६॥

तुह्मरो मन्त्र बिभीषन माना ।
लङ्केस्वर भए सब जग जाना ॥१७॥

जुग सहस्र जोजन पर भानु ।
लील्यो ताहि मधुर फल जानू ॥१८॥

प्रभु मुद्रिका मेलि मुख माहीं ।
जलधि लाँघि गये अचरज नाहीं ॥१९॥

दुर्गम काज जगत के जेते ।
सुगम अनुग्रह तुह्मरे तेते ॥२०॥

राम दुआरे तुम रखवारे ।
होत न आज्ञा बिनु पैसारे ॥२१॥

सब सुख लहै तुह्मारी सरना ।
तुम रच्छक काहू को डर ना ॥२२॥

आपन तेज सह्मारो आपै ।
तीनों लोक हाँक तें काँपै ॥२३॥

भूत पिसाच निकट नहिं आवै ।
महाबीर जब नाम सुनावै ॥२४॥

नासै रोग हरै सब पीरा ।
जपत निरन्तर हनुमत बीरा ॥२५॥

सङ्कट तें हनुमान छुड़ावै ।
मन क्रम बचन ध्यान जो लावै ॥२६॥

सब पर राम तपस्वी राजा ।
तिन के काज सकल तुम साजा ॥२७॥

और मनोरथ जो कोई लावै ।
सोई अमित जीवन फल पावै ॥२८॥

चारों जुग परताप तुह्मारा ।
है परसिद्ध जगत उजियारा ॥२९॥

साधु सन्त के तुम रखवारे ।
असुर निकन्दन राम दुलारे ॥३०॥

अष्टसिद्धि नौ निधि के दाता ।
अस बर दीन जानकी माता ॥३१॥

राम रसायन तुह्मरे पासा ।
सदा रहो रघुपति के दासा ॥३२॥

तुह्मरे भजन राम को पावै ।
जनम जनम के दुख बिसरावै ॥३३॥

अन्त काल रघुबर पुर जाई ।
जहाँ जन्म हरिभक्त कहाई ॥३४॥

और देवता चित्त न धरई ।
हनुमत सेइ सर्ब सुख करई ॥३५॥

सङ्कट कटै मिटै सब पीरा ।
जो सुमिरै हनुमत बलबीरा ॥३६॥

जय जय जय हनुमान गोसाईं ।
कृपा करहु गुरुदेव की नाईं ॥३७॥

जो सत बार पाठ कर कोई ।
छूटहि बन्दि महा सुख होई ॥३८॥

जो यह पढ़ै हनुमान चालीसा ।
होय सिद्धि साखी गौरीसा ॥३९॥

तुलसीदास सदा हरि चेरा ।
कीजै नाथ हृदय महँ डेरा ॥४०॥

॥दोहा॥

पवनतनय सङ्कट हरन मङ्गल मूरति रूप ।
राम लखन सीता सहित हृदय बसहु सुर भूप ॥

आरती श्री हनुमान जी की

आरति कीजै हनुमान लला की |
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ||

जाके बल से गिरिवर कांपै |
रोग – दोष जाके निकट न झांपै ||

अंजनी पुत्र महा बलदाई |
सन्तन के प्रेम सदा सहाई ||

दे बीरा रघुनाथ पठाये |
लंका जारि सिया सुधि लाये ||

लंका सो कोट समुद्र सी खाई |
जात पवनसुत बार न लाई||

लंक जारि असुर संहारे |
सिया रामजी के काज सँवारे ||

लक्ष्मण मूर्छित पड़े सकारे |
आनि सजीवन प्रान उबारे||

पैठि पताल तोरि जम – कारे |
अहिरावन की भुजा उखारे ||

बायें भुजा असुर दल मारे |
दहिने भुजा सन्तजन तारे ||

सुर नर मुनि आरती उतारे |
जै जै जै हनुमान उचारे ||

कंचन थार कपूर लौ छाई |
आरती करत अंजना माई ||

जो हनुमान जी की आरती गावै |
बसि बैकुंठ परम पद पावै ||

लंक विध्वंस किये रघुराई |
तुलसीदास स्वामी कीर्ति गाई ||

आरति कीजै हनुमान लला की |
दुष्ट दलन रघुनाथ कला की ||

आरती कुंज बिहारी की

आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की
गले में बैजंती माला, बजावै मुरली मधुर बाला।
श्रवण में कुण्डल झलकाला, नंद के आनंद नंदलाला।
गगन सम अंग कांति काली, राधिका चमक रही आली।
लतन में ठाढ़े बनमाली;
भ्रमर सी अलक, कस्तूरी तिलक, चंद्र सी झलक;
ललित छवि श्यामा प्यारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
 
कनकमय मोर मुकुट बिलसै, देवता दरसन को तरसैं।
गगन सों सुमन रासि बरसै;
बजे मुरचंग, मधुर मिरदंग, ग्वालिन संग;
अतुल रति गोप कुमारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
 
जहां ते प्रकट भई गंगा, कलुष कलि हारिणि श्रीगंगा।
स्मरन ते होत मोह भंगा;
बसी सिव सीस, जटा के बीच, हरै अघ कीच;
चरन छवि श्रीबनवारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
 
चमकती उज्ज्वल तट रेनू, बज रही वृंदावन बेनू।
चहुं दिसि गोपि ग्वाल धेनू;
हंसत मृदु मंद,चांदनी चंद, कटत भव फंद;
टेर सुन दीन भिखारी की॥
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की
श्री गिरिधर कृष्णमुरारी की॥
 
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥
आरती कुंजबिहारी की, श्री गिरिधर कृष्ण मुरारी की॥

ॐ जय जगदीश हरे – आरती श्री विष्णु जी की

ॐ जय जगदीश हरे,
स्वामी जय जगदीश हरे |
भक्त जनों के संकट,
दास जनों के संकट,
क्षण में दूर करे |
ॐ जय जगदीश हरे ||

जो ध्यावे फल पावे,
दुःखबिन से मन का,
स्वामी दुःखबिन से मन का |
सुख सम्पति घर आवे,
सुख सम्पति घर आवे,
कष्ट मिटे तन का |
ॐ जय जगदीश हरे ||

मात पिता तुम मेरे,
शरण गहूं किसकी,
स्वामी शरण गहूं मैं किसकी |
तुम बिन और न दूजा,
तुम बिन और न दूजा,
आस करूं मैं जिसकी |
ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम पूरण परमात्मा,
तुम अन्तर्यामी,
स्वामी तुम अन्तर्यामी |
पारब्रह्म परमेश्वर,
पारब्रह्म परमेश्वर,
तुम सब के स्वामी |
ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम करुणा के सागर,
तुम पालनकर्ता,
स्वामी तुम पालनकर्ता |
मैं मूरख फलकामी
मैं सेवक तुम स्वामी,
कृपा करो भर्ता |
ॐ जय जगदीश हरे ||

तुम हो एक अगोचर,
सबके प्राणपति,
स्वामी सबके प्राणपति |
किस विधि मिलूं दयामय,
किस विधि मिलूं दयामय,
तुमको मैं कुमति |
ॐ जय जगदीश हरे ||

दीन-बन्धु दुःख-हर्ता,
ठाकुर तुम मेरे,
स्वामी रक्षक तुम मेरे |
अपने हाथ उठाओ,
अपने शरण लगाओ
द्वार पड़ा तेरे |
ॐ जय जगदीश हरे ||

विषय-विकार मिटाओ,
पाप हरो देवा,
स्वमी पाप हरो देवा |
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
श्रद्धा भक्ति बढ़ाओ,
सन्तन की सेवा |
ॐ जय जगदीश हरे ||

जय लक्ष्मी माता – माँ लक्ष्मी जी की आरती

ओम जय लक्ष्मी माता
मैया जय लक्समी माता
तुमको निस दिन सेवत
हरि विष्णु विधाता

मैया जय लक्ष्मी माता

उमा रमा ब्रह्माणी तुम ही जग माता
मैया तुम ही जग माता
सूर्य चन्द्रमा ध्यावत नारद ऋषि गाता

ओम जय लक्ष्मी माता

दुर्गा रूप निरंजनी सुख संपत्ति दाता
मैया सुख संपत्ति दाता
जो कोई तुमको ध्यावत रिद्धी सिद्धि धन पाता

ओम जय लक्ष्मी माता

तुम पाताल निवासनी तुम ही शुभ दाता
मैया तुम ही शुभ दाता
कर्म प्रभाव प्रकाशनी भाव निधि की त्राता

ओम जय लक्ष्मी माता

जिस घर में तुम रहते सब सद गुण आता
मैया सब सद गुण आता
सब संभव हो जाता मन नहीं घबराता

ओम जय लक्ष्मी माता

तुम बिन यज्ञ ना होवे वस्त्र ना कोई पाता
मैया वस्त्र ना कोई पाता
खान पान का वैभव सब तुम से आता

ओम जय लक्ष्मी माता

शुभ गुण मंदिर सुन्दर क्षीरोदधि जाता
मैया क्षीरोदधि जाता
रत्न चतुर्दश तुम बिन कोई नहीं पाता

ओम जय लक्ष्मी माता

महा लक्ष्मी जी की आरती जो कोई नर गाता
मैया जो कोई नर गाता
उर आनंद समाता पाप उतर जाता

ओम जय लक्ष्मी माता

मैया जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता
तुमको निस दिन सेवत मैयाजी को निस दिन सेवत
हरि विष्णु विधाता

ओम जय लक्ष्मी माता

मैया जय लक्ष्मी माता, मैया जय लक्ष्मी माता

तुमको निस दिन सेवत
हरि विष्णु विधाता
मैया जय लक्ष्मी माता

माँ लक्ष्मी की जय

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